॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.44.39
स नित्यदोद्विग्नधिया तमीश्वरं
पिबन् वदन् वा विचरन् स्वपन् श्वसन्।
ददर्श चक्रायुधमग्रतो य-
स्तदेव रूपं दुरवापमाप॥ ३९
sa nityadodvignadhiyā tamīśvaraṃ
piban vadan vā vicaran svapan śvasan|
dadarśa cakrāyudhamagrato ya-
stadeva rūpaṃ duravāpamāpa|| 39
अर्थ
कंस नित्य-निरन्तर बड़ी घबड़ाहटके साथ श्रीकृष्णका ही चिन्तन करता रहता था। वह खाते-पीते, सोते-चलते, बोलते और साँस लेते—सब समय अपने सामने चक्र हाथमें लिये भगवान् श्रीकृष्णको ही देखता रहता था। इस नित्य चिन्तनके फलस्वरूप—वह चाहे द्वेषभावसे ही क्यों न किया गया हो—उसे भगवान्के उसी रूपकी प्राप्ति हुई, सारूप्य मुक्ति हुई, जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े तपस्वी योगियोंके लिये भी कठिन है॥ ३९॥