श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.44.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 44 · अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः

पुण्या बत व्रजभुवो यदयं नृलिंग-

गूढः पुराणपुरुषो वनचित्रमाल्यः।

गाः पालयन् सहबलः क्वणयंश्‍च वेणुं

विक्रीडयाञ्चति गिरित्ररमार्चिताङ्‌घ्रिः॥ १३

puṇyā bata vrajabhuvo yadayaṃ nṛliṃga-

gūḍhaḥ purāṇapuruṣo vanacitramālyaḥ|

gāḥ pālayan sahabalaḥ kvaṇayaṃśca veṇuṃ

vikrīḍayāñcati giritraramārcitāṅghriḥ|| 13

अर्थ

सखी! सच पूछो तो व्रजभूमि ही परम पवित्र और धन्य है। क्योंकि वहाँ ये पुरुषोत्तम मनुष्यके वेषमें छिपकर रहते हैं। स्वयं भगवान् शंकर और लक्ष्मीजी जिनके चरणोंकी पूजा करती हैं, वे ही प्रभु वहाँ रंग-बिरंगे जंगली पुष्पोंकी माला धारण कर लेते हैं तथा बलरामजीके साथ बाँसुरी बजाते, गौएँ चराते और तरह-तरहके खेल खेलते हुए आनन्दसे विचरते हैं॥ १३॥

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