श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.44.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 44 · अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः

किं न पश्यत रामस्य मुखमाताम्रलोचनम्।

मुष्टिकं प्रति सामर्षं हाससंरम्भशोभितम्॥ १२

kiṃ na paśyata rāmasya mukhamātāmralocanam|

muṣṭikaṃ prati sāmarṣaṃ hāsasaṃrambhaśobhitam|| 12

अर्थ

सखियो! क्या तुम नहीं देख रही हो कि बलरामजीका मुख मुष्टिकके प्रति क्रोधके कारण कुछ-कुछ लाल लोचनोंसे युक्त हो रहा है! फिर भी हास्यका अनिरुद्ध आवेग कितना सुन्दर लग रहा है॥ १२॥

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