श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.43.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 43 · अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

पुच्छे प्रगृह्यातिबलं धनुषः पंचविंशतिम्।

विचकर्ष यथा नागं सुपर्ण इव लीलया॥ ८

pucche pragṛhyātibalaṃ dhanuṣaḥ paṃcaviṃśatim|

vicakarṣa yathā nāgaṃ suparṇa iva līlayā|| 8

अर्थ

इसके बाद भगवान् उस बलवान् हाथीकी पूँछ पकड़कर खेल-खेलमें ही उसे सौ हाथतक पीछे घसीट लाये; जैसे गरुड़ साँपको घसीट लाते हैं॥ ८॥

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