श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.43.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 43 · अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

प्रियं राज्ञः प्रकुर्वन्त्यः श्रेयो विन्दन्ति वै प्रजाः।

मनसा कर्मणा वाचा विपरीतमतोऽन्यथा॥ ३३

priyaṃ rājñaḥ prakurvantyaḥ śreyo vindanti vai prajāḥ|

manasā karmaṇā vācā viparītamato'nyathā|| 33

अर्थ

देखो भाई! जो प्रजा मन, वचन और कर्मसे राजाका प्रिय कार्य करती है, उसका भला होता है और जो राजाकी इच्छाके विपरीत काम करती है, उसे हानि उठानी पड़ती है॥ ३३॥

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