श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.43.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 43 · अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

गोप्योऽस्य नित्यमुदितहसितप्रेक्षणं मुखम्।

पश्यन्त्यो विविधांस्तापांस्तरन्ति स्माश्रमं मुदा॥ २८

gopyo'sya nityamuditahasitaprekṣaṇaṃ mukham|

paśyantyo vividhāṃstāpāṃstaranti smāśramaṃ mudā|| 28

अर्थ

गोपियाँ इनकी मन्द-मन्द मुसकान, मधुर चितवन और सर्वदा एकरस प्रसन्‍न रहनेवाले मुखारविन्दके दर्शनसे आनन्दित रहती थीं और अनायास ही सब प्रकारके तापोंसे मुक्त हो जाती थीं॥ २८॥

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