श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.43.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 43 · अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

कुवलयापीडका उद्धार और अखाड़ेमें प्रवेश

श्रीशुक उवाच

अथ कृष्णश्‍च रामश्‍च कृतशौचौ परन्तप।

मल्लदुन्दुभिनिर्घोषं श्रुत्वा द्रष्टुमुपेयतुः॥ १

atha kṛṣṇaśca rāmaśca kṛtaśaucau parantapa|

malladundubhinirghoṣaṃ śrutvā draṣṭumupeyatuḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—काम-क्रोधादि शत्रुओंको पराजित करनेवाले परीक्षित्! अब श्रीकृष्ण और बलराम भी स्नानादि नित्यकर्मसे निवृत्त हो दंगलके अनुरूप नगाड़ेकी ध्वनि सुनकर रंगभूमि देखनेके लिये चल पड़े॥ १॥

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