श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.42.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 42 · अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

कंसः परिवृतोऽमात्यै राजमंच उपाविशत्।

मण्डलेश्‍वरमध्यस्थो हृदयेन विदूयता॥ ३५

kaṃsaḥ parivṛto'mātyai rājamaṃca upāviśat|

maṇḍaleśvaramadhyastho hṛdayena vidūyatā|| 35

अर्थ

राजा कंस अपने मन्त्रियोंके साथ मण्डलेश्‍वरों (छोटे-छोटे राजाओं) के बीचमें सबसे श्रेष्ठ राजसिंहासनपर जा बैठा। इस समय भी अपशकुनोंके कारण उसका चित्त घबड़ाया हुआ था॥ ३५॥

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