श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.42.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 42 · अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

स्वप्ने प्रेतपरिष्वंगः खरयानं विषादनम्।

यायान्‍नलदमाल्येकस्तैलाभ्यक्तो दिगम्बरः॥ ३०

svapne pretapariṣvaṃgaḥ kharayānaṃ viṣādanam|

yāyānnaladamālyekastailābhyakto digambaraḥ|| 30

अर्थ

कंसने स्वप्नावस्थामें देखा कि वह प्रेतोंके गले लग रहा है, गधेपर चढ़कर चलता है और विष खा रहा है। उसका सारा शरीर तेलसे तर है, गलेमें जपाकुसुम (अड़हुल)-की माला है और न‌ग्‍न होकर कहीं जा रहा है॥ ३०॥

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