परीक्षित्! मार्गमें स्थान-स्थानपर गाँवोंके लोग मिलनेके लिये आते और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीको देखकर आनन्द-मग्न हो जाते। वे एकटक उनकी ओर देखने लगते, अपनी दृष्टि हटा न पाते॥ ७॥✎ 1672
मार्गे ग्रामजना राजंस्तत्र तत्रोपसंगताः।
वसुदेवसुतौ वीक्ष्य प्रीता दृष्टिं न चाददुः॥ ७
परीक्षित्! मार्गमें स्थान-स्थानपर गाँवोंके लोग मिलनेके लिये आते और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीको देखकर आनन्द-मग्न हो जाते। वे एकटक उनकी ओर देखने लगते, अपनी दृष्टि हटा न पाते॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.41.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 386) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)