श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.51

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

सोऽपि वव्रेऽचलां भक्तिं तस्मिन्‍नेवाखिलात्मनि।

तद्भक्तेषु च सौहार्दं भूतेषु च दयां पराम्॥ ५१

so'pi vavre'calāṃ bhaktiṃ tasminnevākhilātmani|

tadbhakteṣu ca sauhārdaṃ bhūteṣu ca dayāṃ parām|| 51

अर्थ

सुदामा मालीने उनसे यही वर माँगा कि ‘प्रभो! आप ही समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं। सर्वस्वरूप आपके चरणोंमें मेरी अविचल भक्ति हो। आपके भक्तोंसे मेरा सौहार्द, मैत्रीका सम्बन्ध हो और समस्त प्राणियोंके प्रति अहैतुक दयाका भाव बना रहे’॥ ५१॥

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