जब ग्वालबाल और बलरामजीके साथ भगवान् श्रीकृष्ण उन सुन्दर-सुन्दर मालाओंसे अलंकृत हो चुके, तब उन वरदायक प्रभुने प्रसन्न होकर विनीत और शरणागत सुदामाको श्रेष्ठ वर दिये॥ ५०॥
ताभिः स्वलंकृतौ प्रीतौ कृष्णरामौ सहानुगौ।
प्रणताय प्रपन्नाय ददतुर्वरदौ वरान्॥ ५०
जब ग्वालबाल और बलरामजीके साथ भगवान् श्रीकृष्ण उन सुन्दर-सुन्दर मालाओंसे अलंकृत हो चुके, तब उन वरदायक प्रभुने प्रसन्न होकर विनीत और शरणागत सुदामाको श्रेष्ठ वर दिये॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.41.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 392) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/50/