॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.41.5
यत्राद्भुतानि सर्वाणि भूमौ वियति वा जले।
तं त्वानुपश्यतो ब्रह्मन् किं मे दृष्टमिहाद्भुतम्॥ ५
yatrādbhutāni sarvāṇi bhūmau viyati vā jale|
taṃ tvānupaśyato brahman kiṃ me dṛṣṭamihādbhutam|| 5
अर्थ
भगवन्! जितनी भी अद्भुत वस्तुएँ हैं, वे पृथ्वीमें हों या जल अथवा आकाशमें—सब-की-सब जिनमें हैं, उन्हीं आपको मैं देख रहा हूँ! फिर भला, मैंने यहाँ अद्भुत वस्तु कौन-सी देखी?॥ ५॥✎ 1672