श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

प्राह नः सार्थकं जन्म पावितं च कुलं प्रभो।

पितृदेवर्षयो मह्यं तुष्टा ह्यागमनेन वाम्॥ ४५

prāha naḥ sārthakaṃ janma pāvitaṃ ca kulaṃ prabho|

pitṛdevarṣayo mahyaṃ tuṣṭā hyāgamanena vām|| 45

अर्थ

इसके पश्‍चात् उसने प्रार्थना की—‘प्रभो! आप दोनोंके शुभागमनसे हमारा जन्म सफल हो गया। हमारा कुल पवित्र हो गया। आज हम पितर, ऋषि और देवताओंके ऋणसे मुक्त हो गये। वे हमपर परम सन्तुष्ट हैं॥ ४५॥

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