श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

स याचितो भगवता परिपूर्णेन सर्वतः।

साक्षेपं रुषितः प्राह भृत्यो राज्ञः सुदुर्मदः॥ ३४

sa yācito bhagavatā paripūrṇena sarvataḥ|

sākṣepaṃ ruṣitaḥ prāha bhṛtyo rājñaḥ sudurmadaḥ|| 34

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् सर्वत्र परिपूर्ण हैं। सब कुछ उन्हींका है। फिर भी उन्होंने इस प्रकार माँगनेकी लीला की। परन्तु वह मूर्ख राजा कंसका सेवक होनेके कारण मतवाला हो रहा था। भगवान्‌की वस्तु भगवान्‌को देना तो दूर रहा, उसने क्रोधमें भरकर आक्षेप करते हुए कहा—॥ ३४॥

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