॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.40.5
त्रय्या च विद्यया केचित् त्वां वै वैतानिका द्विजाः।
यजन्ते विततैर्यज्ञैर्नानारूपामराख्यया॥ ५
trayyā ca vidyayā kecit tvāṃ vai vaitānikā dvijāḥ|
yajante vitatairyajñairnānārūpāmarākhyayā|| 5
अर्थ
बहुत-से कर्मकाण्डी ब्राह्मण कर्ममार्गका उपदेश करनेवाली त्रयीविद्याके द्वारा, जो आपके इन्द्र, अग्नि आदि अनेक देववाचक नाम तथा वज्रहस्त, सप्तार्चि आदि अनेक रूप बतलाती है, बड़े-बड़े यज्ञ करते हैं और उनसे आपकी ही उपासना करते हैं॥ ५॥