॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.40.4
त्वां योगिनो यजन्त्यद्धा महापुरुषमीश्वरम्।
साध्यात्मं साधिभूतं च साधिदैवं च साधवः॥ ४
tvāṃ yogino yajantyaddhā mahāpuruṣamīśvaram|
sādhyātmaṃ sādhibhūtaṃ ca sādhidaivaṃ ca sādhavaḥ|| 4
अर्थ
साधु योगी स्वयं अपने अन्तःकरणमें स्थित ‘अन्तर्यामी’ के रूपमें, समस्त भूत-भौतिक पदार्थोंमें व्याप्त ‘परमात्माके’ रूपमें और सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि देवमण्डलमें स्थित ‘इष्ट-देवता’ के रूपमें तथा उनके साक्षी महापुरुष एवं नियन्ता ईश्वरके रूपमें साक्षात् आपकी ही उपासना करते हैं॥ ४॥