श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

नमस्तेऽद्भुतसिंहाय साधुलोकभयापह।

वामनाय नमस्तुभ्यं क्रान्तत्रिभुवनाय च॥ १९

namaste'dbhutasiṃhāya sādhulokabhayāpaha|

vāmanāya namastubhyaṃ krāntatribhuvanāya ca|| 19

अर्थ

प्रह्लाद-जैसे साधुजनोंका भय मिटानेवाले प्रभो! आपके उस अलौकिक नृसिंह-रूपको मैं नमस्कार करता हूँ। आपने वामनरूप ग्रहण करके अपने पगोंसे तीनों लोक नाप लिये थे, आपको मैं नमस्कार करता हूँ॥ १९॥✎ 1928

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1928 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यदु-वंशियोंका → यदुवंशियोंका

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