श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

अकूपाराय बृहते नमो मन्दरधारिणे।

क्षित्युद्धारविहाराय नमः सूकरमूर्तये॥ १८

akūpārāya bṛhate namo mandaradhāriṇe|

kṣityuddhāravihārāya namaḥ sūkaramūrtaye|| 18

अर्थ

आपने ही वह विशाल कच्छपरूप ग्रहण करके मन्दराचलको धारण किया था, आपको मैं नमस्कार करता हूँ। आपने ही पृथ्वीके उद्धारकी लीला करनेके लिये वराहरूप स्वीकार किया था, आपको मेरा बार-बार नमस्कार॥ १८॥

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