श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.4.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यथाऽऽमयोऽङ्गे समुपेक्षितो नृभि-

र्न शक्यते रूढपदश्‍चिकित्सितुम्।

यथेन्द्रियग्राम उपेक्षितस्तथा

रिपुर्महान् बद्धबलो न चाल्यते॥ ३८

yathā''mayo'ṅge samupekṣito nṛbhi-

rna śakyate rūḍhapadaścikitsitum|

yathendriyagrāma upekṣitastathā

ripurmahān baddhabalo na cālyate|| 38

अर्थ

जब मनुष्यके शरीरमें रोग हो जाता है और उसकी चिकित्सा नहीं की जाती—उपेक्षा कर दी जाती है, तब रोग अपनी जड़ जमा लेता है और फिर वह असाध्य हो जाता है। अथवा जैसे इन्द्रियोंकी उपेक्षा कर देनेपर उनका दमन असम्भव हो जाता है, वैसे ही यदि पहले शत्रुकी उपेक्षा कर दी जाय और वह अपना पाँव जमा ले, तो फिर उसको हराना कठिन हो जाता है॥ ३८॥

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