श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.4.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तथापि देवाः सापत्‍न्यान्‍नोपेक्ष्या इति मन्महे।

ततस्तन्मूलखनने नियुङ्क्ष्वास्माननुव्रतान्॥ ३७

tathāpi devāḥ sāpatnyānnopekṣyā iti manmahe|

tatastanmūlakhanane niyuṅkṣvāsmānanuvratān|| 37

अर्थ

फिर भी देवताओंकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये—ऐसी हमारी राय है। क्योंकि हैं तो वे शत्रु ही। इसलिये उनकी जड़ उखाड़ फेंकनेके लिये आप हम-जैसे विश्‍वासपात्र सेवकोंको नियुक्त कर दीजिये॥ ३७॥

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