फिर भी देवताओंकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये—ऐसी हमारी राय है। क्योंकि हैं तो वे शत्रु ही। इसलिये उनकी जड़ उखाड़ फेंकनेके लिये आप हम-जैसे विश्वासपात्र सेवकोंको नियुक्त कर दीजिये॥ ३७॥
तथापि देवाः सापत्न्यान्नोपेक्ष्या इति मन्महे।
ततस्तन्मूलखनने नियुङ्क्ष्वास्माननुव्रतान्॥ ३७
फिर भी देवताओंकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये—ऐसी हमारी राय है। क्योंकि हैं तो वे शत्रु ही। इसलिये उनकी जड़ उखाड़ फेंकनेके लिये आप हम-जैसे विश्वासपात्र सेवकोंको नियुक्त कर दीजिये॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 149) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/37/