श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.4.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अस्यतस्ते शरव्रातैर्हन्यमानाः समन्ततः।

जिजीविषव उत्सृज्य पलायनपरा ययुः॥ ३३

asyataste śaravrātairhanyamānāḥ samantataḥ|

jijīviṣava utsṛjya palāyanaparā yayuḥ|| 33

अर्थ

जिस समय युद्धभूमिमें आप चोट-पर-चोट करने लगते हैं, बाण-वर्षासे घायल होकर अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये समरांगण छोड़कर देवतालोग पलायन-परायण होकर इधर-उधर भाग जाते हैं॥ ३३॥

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