॥ श्रीहरिः ॥
किमुद्यमैः करिष्यन्ति देवाः समरभीरवः।
नित्यमुद्विग्नमनसो ज्याघोषैर्धनुषस्तव॥ ३२
kimudyamaiḥ kariṣyanti devāḥ samarabhīravaḥ|
nityamudvignamanaso jyāghoṣairdhanuṣastava|| 32
अर्थ
समरभीरु देवगण युद्धोद्योग करके ही क्या करेंगे? वे तो आपके धनुषकी टंकार सुनकर ही सदा-सर्वदा घबराये रहते हैं॥ ३२॥
किमुद्यमैः करिष्यन्ति देवाः समरभीरवः।
नित्यमुद्विग्नमनसो ज्याघोषैर्धनुषस्तव॥ ३२
समरभीरु देवगण युद्धोद्योग करके ही क्या करेंगे? वे तो आपके धनुषकी टंकार सुनकर ही सदा-सर्वदा घबराये रहते हैं॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 149) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/32/