श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.4.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स तल्पात् तूर्णमुत्थाय कालोऽयमिति विह्वलः।

सूतीगृहमगात् तूर्णं प्रस्खलन् मुक्तमूर्धजः॥ ३

sa talpāt tūrṇamutthāya kālo'yamiti vihvalaḥ|

sūtīgṛhamagāt tūrṇaṃ praskhalan muktamūrdhajaḥ|| 3

अर्थ

द्वारपालोंकी बात सुनते ही वह झटपट पलँगसे उठ खड़ा हुआ और बड़ी शीघ्रतासे सूतिकागृहकी ओर झपटा। इस बार तो मेरे कालका ही जन्म हुआ है, यह सोचकर वह विह्वल हो रहा था और यही कारण है कि उसे इस बातका भी ध्यान न रहा कि उसके बाल बिखरे हुए हैं। रास्तेमें कई जगह वह लड़खड़ाकर गिरते-गिरते बचा॥ ३॥

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