श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब वसुदेव और देवकीने इस प्रकार प्रसन्न होकर निष्कपटभावसे कंसके साथ बातचीत की, तब उनसे अनुमति लेकर वह अपने महलमें चला गया॥ २८॥
कंस एवं प्रसन्नाभ्यां विशुद्धं प्रतिभाषितः।
देवकीवसुदेवाभ्यामनुज्ञातोऽविशद् गृहम्॥ २८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब वसुदेव और देवकीने इस प्रकार प्रसन्न होकर निष्कपटभावसे कंसके साथ बातचीत की, तब उनसे अनुमति लेकर वह अपने महलमें चला गया॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 148) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/28/