‘मनस्वी कंस! आप जो कहते हैं, वह ठीक वैसा ही है। जीव अज्ञानके कारण ही शरीर आदिको ‘मैं’ मान बैठते हैं। इसीसे अपने परायेका भेद हो जाता है॥ २६॥
एवमेतन्महाभाग यथा वदसि देहिनाम्।
अज्ञानप्रभवाहंधीः स्वपरेति भिदा यतः॥ २६
‘मनस्वी कंस! आप जो कहते हैं, वह ठीक वैसा ही है। जीव अज्ञानके कारण ही शरीर आदिको ‘मैं’ मान बैठते हैं। इसीसे अपने परायेका भेद हो जाता है॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 148) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/26/