श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.4.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

भ्रातुः समनुतप्तस्य क्षान्त्वा रोषं च देवकी।

व्यसृजद् वसुदेवश्‍च प्रहस्य तमुवाच ह॥ २५

bhrātuḥ samanutaptasya kṣāntvā roṣaṃ ca devakī|

vyasṛjad vasudevaśca prahasya tamuvāca ha|| 25

अर्थ

जब देवकीजीने देखा कि भाई कंसको पश्‍चात्ताप हो रहा है, तब उन्होंने उसे क्षमा कर दिया। वे उसके पहले अपराधोंको भूल गयीं और वसुदेवजीने हँसकर कंससे कहा—॥ २५॥

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