काँल्लोकान् वै गमिष्यामि ब्रह्महेव मृतः श्वसन्॥ १६
sa tvahaṃ tyaktakāruṇyastyaktajñātisuhṛt khalaḥ|
kām̐llokān vai gamiṣyāmi brahmaheva mṛtaḥ śvasan|| 16
अर्थ
मैं इतना दुष्ट हूँ कि करुणाका तो मुझमें लेश भी नहीं है । मैंने अपने भाई-बन्धु और हितैषियोंतकका त्याग कर दिया। पता नहीं, अब मुझे किस नरकमें जाना पड़ेगा। वास्तवमें तो मैं ब्रह्मघातीके समान जीवित होनेपर भी मुर्दा ही हूँ॥ १६॥
स त्वहं त्यक्तकारुण्यस्त्यक्तज्ञातिसुहृत् खलः।
काँल्लोकान् वै गमिष्यामि ब्रह्महेव मृतः श्वसन्॥ १६
मैं इतना दुष्ट हूँ कि करुणाका तो मुझमें लेश भी नहीं है । मैंने अपने भाई-बन्धु और हितैषियोंतकका त्याग कर दिया। पता नहीं, अब मुझे किस नरकमें जाना पड़ेगा। वास्तवमें तो मैं ब्रह्मघातीके समान जीवित होनेपर भी मुर्दा ही हूँ॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 147) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/16/