॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.39.54
प्रह्रादनारदवसुप्रमुखैर्भागवतोत्तमैः ।✎ 1168
स्तूयमानं पृथग्भावैर्वचोभिरमलात्मभिः॥ ५४
prahrādanāradavasupramukhairbhāgavatottamaiḥ |
stūyamānaṃ pṛthagbhāvairvacobhiramalātmabhiḥ|| 54
अर्थ
नन्द-सुनन्द आदि पार्षद अपने ‘स्वामी’, सनकादि परमर्षि ‘परब्रह्म’, ब्रह्मा, महादेव आदि देवता ‘सर्वेश्वर’, मरीचि आदि नौ ब्राह्मण ‘प्रजापति’ और प्रह्लाद-नारद आदि भगवान्के परम प्रेमी भक्त तथा आठों वसु अपने परम प्रियतम ‘भगवान्’ समझकर भिन्न-भिन्न भावोंके अनुसार निर्दोष वेदवाणीसे भगवान्की स्तुति कर रहे हैं॥ ५३-५४॥