श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

तत्रापि च यथापूर्वमासीनौ पुनरेव सः।

न्यमज्जद् दर्शनं यन्मे मृषा किं सलिले तयोः॥ ४३

tatrāpi ca yathāpūrvamāsīnau punareva saḥ|

nyamajjad darśanaṃ yanme mṛṣā kiṃ salile tayoḥ|| 43

अर्थ

वे उस रथपर भी पूर्ववत् बैठे हुए थे। उन्होंने यह सोचकर कि मैंने उन्हें जो जलमें देखा था, वह भ्रम ही रहा होगा, फिर डुबकी लगायी ॥ ४३॥✎ 1433 1434

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1433 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्महृद) → ब्रह्मह्रद)
  • #1434 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मरकत-मणिके → मरकतमणिके

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