श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

गोप्यश्‍च दयितं कृष्णमनुव्रज्यानुरंजिताः।

प्रत्यादेशं भगवतः कांक्षन्त्यश्‍चावतस्थिरे॥ ३४

gopyaśca dayitaṃ kṛṣṇamanuvrajyānuraṃjitāḥ|

pratyādeśaṃ bhagavataḥ kāṃkṣantyaścāvatasthire|| 34

अर्थ

इसी समय अनुरागके रंगमें रँगी हुई गोपियाँ अपने प्राणप्यारे श्रीकृष्णके पास गयीं और उनकी चितवन, मुसकान आदि निरखकर कुछ-कुछ सुखी हुईं। अब वे अपने प्रियतम श्यामसुन्दरसे कुछ सन्देश पानेकी आकांक्षासे वहीं खड़ी हो गयीं॥ ३४॥✎ 889

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #889 शब्दोंके बीचका स्थान: आऊँगा’यह → आऊँगा’ यह

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