श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण-बलरामका मथुरागमन

श्रीशुक उवाच

सुखोपविष्टः पर्यंके रामकृष्णोरुमानितः।

लेभे मनोरथान् सर्वान् पथि यान् स चकार ह॥ १

sukhopaviṣṭaḥ paryaṃke rāmakṛṣṇorumānitaḥ|

lebhe manorathān sarvān pathi yān sa cakāra ha|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने अक्रूरजीका भलीभाँति सम्मान किया। वे आरामसे पलँगपर बैठ गये। उन्होंने मार्गमें जो-जो अभिलाषाएँ की थीं, वे सब पूरी हो गयीं॥ १॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें