॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.38.8
यदर्चितं ब्रह्मभवादिभिः सुरैः
श्रिया च देव्या मुनिभिः ससात्वतैः।
गोचारणायानुचरैश्चरद्वने
यद् गोपिकानां कुचकुंकुमाङ्कितम्॥ ८
yadarcitaṃ brahmabhavādibhiḥ suraiḥ
śriyā ca devyā munibhiḥ sasātvataiḥ|
gocāraṇāyānucaraiścaradvane
yad gopikānāṃ kucakuṃkumāṅkitam|| 8
अर्थ
ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र आदि बड़े-बड़े देवता जिन चरणकमलोंकी उपासना करते रहते हैं, स्वयं भगवती लक्ष्मी एक क्षणके लिये भी जिनकी सेवा नहीं छोड़तीं, प्रेमी भक्तोंके साथ बड़े-बड़े ज्ञानी भी जिनकी आराधनामें संलग्न रहते हैं—भगवान्के वे ही चरणकमल गौओंको चरानेके लिये ग्वालबालोंके साथ वन-वनमें विचरते हैं। वे ही सुर-मुनि-वन्दित श्रीचरण गोपियोंके वक्षःस्थलपर लगी हुई केसरसे रँग जाते हैं, चिह्नित हो जाते हैं,॥ ८॥✎ 1920