श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

कंसो बताद्याकृत मेऽत्यनुग्रहं

द्रक्ष्येऽङ्‌घ्रिपद्मं प्रहितोऽमुना हरेः।

कृतावतारस्य दुरत्ययं तमः

पूर्वेऽतरन् यन्‍नखमण्डलत्विषा॥ ७

kaṃso batādyākṛta me'tyanugrahaṃ

drakṣye'ṅghripadmaṃ prahito'munā hareḥ|

kṛtāvatārasya duratyayaṃ tamaḥ

pūrve'taran yannakhamaṇḍalatviṣā|| 7

अर्थ

अहो! कंसने तो आज मेरे ऊपर बड़ी ही कृपा की है। उसी कंसके भेजनेसे मैं इस भूतलपर अवतीर्ण स्वयं भगवान्‌के चरणकमलोंके दर्शन पाऊँगा। जिनके नखमण्डलकी कान्तिका ध्यान करके पहले युगोंके ऋषि-महर्षि इस अज्ञानरूप अपार अन्धकार-राशिको पार कर चुके हैं, स्वयं वही भगवान् तो अवतार ग्रहण करके प्रकट हुए हैं॥ ७॥✎ 1920

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1920 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): वक्ष:-स्थलपर → वक्षःस्थलपर

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