श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

दिशो वितिमिरा राजन् कुर्वाणौ प्रभया स्वया।

यथा मारकतः शैलो रौप्यश्‍च कनकाचितौ॥ ३३

diśo vitimirā rājan kurvāṇau prabhayā svayā|

yathā mārakataḥ śailo raupyaśca kanakācitau|| 33

अर्थ

परीक्षित्! अक्रूरने देखा कि जगत‍्के आदिकारण, जगत‍्के परमपति, पुरुषोत्तम ही संसारकी रक्षाके लिये अपने सम्पूर्ण अंशोंसे बलरामजी और श्रीकृष्णके रूपमें अवतीर्ण होकर अपनी अंगकान्तिसे दिशाओंका अन्धकार दूर कर रहे हैं। वे ऐसे भले मालूम होते थे, जैसे सोनेसे मढ़े हुए मरकतमणि और चाँदीके पर्वत जगमगा रहे हों॥ ३२-३३॥

यह अर्थ श्लोक 32–33 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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