श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

समर्हणं यत्र निधाय कौशिक-

स्तथा बलिश्‍चाप जगत्त्रयेन्द्रताम्।

यद् वा विहारे व्रजयोषितां श्रमं

स्पर्शेन सौगन्धिकगन्ध्यपानुदत्॥ १७

samarhaṇaṃ yatra nidhāya kauśika-

stathā baliścāpa jagattrayendratām|

yad vā vihāre vrajayoṣitāṃ śramaṃ

sparśena saugandhikagandhyapānudat|| 17

अर्थ

इन्द्र तथा दैत्यराज बलिने भगवान्‌के उन्हीं करकमलोंमें पूजाकी भेंट समर्पित करके तीनों लोकोंका प्रभुत्व—इन्द्रपद प्राप्त कर लिया। भगवान्‌के उन्हीं करकमलोंने, जिनमेंसे दिव्य कमलकी-सी सुगन्ध आया करती है, अपने स्पर्शसे रासलीलाके समय व्रजयुवतियोंकी सारी थकान मिटा दी थी॥ १७॥✎ 1920

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1920 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): वक्ष:-स्थलपर → वक्षःस्थलपर

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