श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

अप्यङ्‌घ्रिमूले पतितस्य मे विभुः

शिरस्यधास्यन्‍निजहस्तपंकजम् ।

दत्ताभयं कालभुजंगरंहसा

प्रोद्वेजितानां शरणैषिणां नृणाम्॥ १६

apyaṅghrimūle patitasya me vibhuḥ

śirasyadhāsyannijahastapaṃkajam |

dattābhayaṃ kālabhujaṃgaraṃhasā

prodvejitānāṃ śaraṇaiṣiṇāṃ nṛṇām|| 16

अर्थ

मेरे अहोभाग्य! जब मैं उनके चरण-कमलोंमें गिर जाऊँगा, तब क्या वे अपना करकमल मेरे सिरपर रख देंगे? उनके वे करकमल उन लोगोंको सदाके लिये अभयदान दे चुके हैं, जो कालरूपी साँपके भयसे अत्यन्त घबड़ाकर उनकी शरण चाहते और शरणमें आ जाते हैं॥ १६॥✎ 1920

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1920 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): वक्ष:-स्थलपर → वक्षःस्थलपर

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