श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं यदुपतिं कृष्णं भागवतप्रवरो मुनिः।

प्रणिपत्याभ्यनुज्ञातो ययौ तद्दर्शनोत्सवः॥ २५

evaṃ yadupatiṃ kṛṣṇaṃ bhāgavatapravaro muniḥ|

praṇipatyābhyanujñāto yayau taddarśanotsavaḥ|| 25

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌के परमप्रेमी भक्त देवर्षि नारदजीने इस प्रकार भगवान्‌की स्तुति और प्रणाम किया। भगवान्‌के दर्शनोंके आह्लादसे नारदजीका रोम-रोम खिल उठा। तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्त करके वे चले गये॥ २५॥

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