श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

पतन्त्य२कालतो गर्भाः स्रवन्ति स्म भयेन वै।

निर्विशन्ति घना यस्य ककुद्यचलशंकया॥ ४

patantyakālato garbhāḥ sravanti sma bhayena vai|

nirviśanti ghanā yasya kakudyacalaśaṃkayā|| 4

अर्थ

बीच-बीचमें बार-बार मूतता और गोबर छोड़ता जाता था। आँखें फाड़कर इधर-उधर दौड़ रहा था। परीक्षित्! उसके जोरसे हँकड़नेसे—निष्ठुर गर्जनासे भयवश स्त्रियों और गौओंके तीन-चार महीनेके गर्भ स्रवित हो जाते थे और पाँच-छः महीनेके गिर जाते थे। और तो क्या कहूँ, उसके ककुद्को पर्वत समझकर बादल उसपर आकर ठहर जाते थे॥ ३-४॥

यह अर्थ श्लोक 3–4 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. २

    न्त्वाकालिका गर्भाः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 357)

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