श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

यशोदायाः सुतां कन्यां देवक्याः कृष्णमेव च।

रामं च रोहिणीपुत्रं वसुदेवेन बिभ्यता॥ १७

yaśodāyāḥ sutāṃ kanyāṃ devakyāḥ kṛṣṇameva ca|

rāmaṃ ca rohiṇīputraṃ vasudevena bibhyatā|| 17

अर्थ

‘कंस! जो कन्या तुम्हारे हाथसे छूटकर आकाशमें चली गयी, वह तो यशोदाकी पुत्री थी। और व्रजमें जो श्रीकृष्ण हैं, वे देवकीके पुत्र हैं। वहाँ जो बलरामजी हैं, वे रोहिणीके पुत्र हैं। वसुदेवने तुमसे डरकर अपने मित्र नन्दके पास उन दोनोंको रख दिया है। उन्होंने ही तुम्हारे अनुचर दैत्योंका वध किया है।’ यह बात सुनते ही कंसकी एक-एक इन्द्रिय क्रोधके मारे काँप उठी॥ १७-१८॥

यह अर्थ श्लोक 17–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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