श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

असृग् वमन् मूत्रशकृत् समुत्सृजन्

क्षिपंश्‍च पादाननवस्थितेक्षणः।

जगाम कृच्छ्रं निर्ऋतेरथ क्षयं ✎ 1161 1162 2174

पुष्पैः किरन्तो हरिमीडिरे सुराः॥ १४ ✎ 2174

asṛg vaman mūtraśakṛt samutsṛjan

kṣipaṃśca pādānanavasthitekṣaṇaḥ|

jagāma kṛcchraṃ nir:ṛteratha kṣayaṃ

puṣpaiḥ kiranto harimīḍire surāḥ|| 14

अर्थ

परीक्षित्! इस प्रकार वह दैत्य मुँहसे खून उगलता और गोबर-मूत करता हुआ पैर पटकने लगा। उसकी आँखें उलट गयीं और उसने बड़े कष्टके साथ प्राण छोड़े। अब देवतालोग भगवान्‌पर फूल बरसा-बरसाकर उनकी स्तुति करने लगे॥ १४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1161 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्तेरथ → निऋर्ऋतेरथ
  • #1162 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋतेरथ → निर्ऋतेरथ
  • #2174 छूटा या अधिक पाठ: जगाम कृच्छ्रं निर्ऋतेरथ क्षयं पुष्पैः / किरन्तो हरिमीडिरे सुराः॥ १४ → जगाम कृच्छ्रं निर्ऋतेरथ क्षयं / पुष्पैः किरन्तो हरिमीडिरे सुराः॥ १४

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