ग्रस्तं च दृष्ट्वा विभ्रान्ताः सर्पं विव्यधुरुल्मुकैः॥ ७
tasya cākranditaṃ śrutvā gopālāḥ sahasotthitāḥ|
grastaṃ ca dṛṣṭvā vibhrāntāḥ sarpaṃ vivyadhurulmukaiḥ|| 7
अर्थ
नन्दबाबाका चिल्लाना सुनकर सब-के-सब गोप एकाएक उठ खड़े हुए और उन्हें अजगरके मुँहमें देखकर घबड़ा गये। अब वे लुकाठियों (अधजली लकड़ियों) से उस अजगरको मारने लगे॥ ७॥✎ 16702092
तस्य चाक्रन्दितं श्रुत्वा गोपालाः सहसोत्थिताः।
ग्रस्तं च दृष्ट्वा विभ्रान्ताः सर्पं विव्यधुरुल्मुकैः॥ ७
नन्दबाबाका चिल्लाना सुनकर सब-के-सब गोप एकाएक उठ खड़े हुए और उन्हें अजगरके मुँहमें देखकर घबड़ा गये। अब वे लुकाठियों (अधजली लकड़ियों) से उस अजगरको मारने लगे॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.34.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 347) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/34/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)