॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.34.19
निशाम्य कृष्णस्य तदात्मवैभवं
व्रजौकसो विस्मितचेतसस्ततः।
समाप्य तस्मिन् नियमं पुनर्व्रजं
नृपाययुस्तत् कथयन्त आदृताः॥ १९
niśāmya kṛṣṇasya tadātmavaibhavaṃ
vrajaukaso vismitacetasastataḥ|
samāpya tasmin niyamaṃ punarvrajaṃ
nṛpāyayustat kathayanta ādṛtāḥ|| 19
अर्थ
राजन्! जब व्रजवासियोंने भगवान् श्रीकृष्णका यह अद्भुत प्रभाव देखा, तब उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। उन लोगोंने उस क्षेत्रमें जो नियम ले रखे थे, उनको पूर्ण करके वे बड़े आदर और प्रेमसे श्रीकृष्णकी उस लीलाका गान करते हुए पुनः व्रजमें लौट आये॥ १९॥