ब्रह्मन्! वे धर्ममर्यादाके बनानेवाले, उपदेश करनेवाले और रक्षक थे। फिर उन्होंने स्वयं धर्मके विपरीत परस्त्रियोंका स्पर्श कैसे किया॥ २८॥
स कथं धर्मसेतूनां वक्ता कर्ताभिरक्षिता।
प्रतीपमाचरद् ब्रह्मन् परदाराभिमर्शनम्॥ २८
ब्रह्मन्! वे धर्ममर्यादाके बनानेवाले, उपदेश करनेवाले और रक्षक थे। फिर उन्होंने स्वयं धर्मके विपरीत परस्त्रियोंका स्पर्श कैसे किया॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.33.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 336) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/28/