श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

स कथं धर्मसेतूनां वक्ता कर्ताभिरक्षिता।

प्रतीपमाचरद् ब्रह्मन् परदाराभिमर्शनम्॥ २८

sa kathaṃ dharmasetūnāṃ vaktā kartābhirakṣitā|

pratīpamācarad brahman paradārābhimarśanam|| 28

अर्थ

ब्रह्मन्! वे धर्ममर्यादाके बनानेवाले, उपदेश करनेवाले और रक्षक थे। फिर उन्होंने स्वयं धर्मके विपरीत परस्त्रियोंका स्पर्श कैसे किया॥ २८॥

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