श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

राजोवाच

संस्थापनाय धर्मस्य प्रशमायेतरस्य च।

अवतीर्णो हि भगवानंशेन जगदीश्‍वरः॥ २७

saṃsthāpanāya dharmasya praśamāyetarasya ca|

avatīrṇo hi bhagavānaṃśena jagadīśvaraḥ|| 27

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! भगवान् श्रीकृष्ण सारे जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। उन्होंने अपने अंश श्रीबलरामजीके सहित पूर्णरूपमें अवतार ग्रहण किया था। उनके अवतारका उद्देश्य ही यह था कि धर्मकी स्थापना हो और अधर्मका नाश॥ २७॥

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