श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

सर्वास्ताः केशवालोकपरमोत्सवनिर्वृताः।

जहुर्विरहजं तापं प्राज्ञं प्राप्य यथा जनाः॥ ९

sarvāstāḥ keśavālokaparamotsavanirvṛtāḥ|

jahurvirahajaṃ tāpaṃ prājñaṃ prāpya yathā janāḥ|| 9

अर्थ

परीक्षित्! जैसे मुमुक्षुजन परम ज्ञानी संत पुरुषको प्राप्त करके संसारकी पीड़ासे मुक्त हो जाते हैं, वैसे ही सभी गोपियोंको भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे परम आनन्द और परम उल्लास प्राप्त हुआ। उनके विरहके कारण गोपियोंको जो दुःख हुआ था, उससे वे मुक्त हो गयीं और शान्तिके समुद्रमें डूबने-उतराने लगीं॥ ९॥

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