सातवीं गोपी नेत्रोंके मार्गसे भगवान्को अपने हृदयमें ले गयी और फिर उसने आँखें बंद कर लीं। अब मन-ही-मन भगवान्का आलिंगन करनेसे उसका शरीर पुलकित हो गया, रोम-रोम खिल उठा और वह सिद्ध योगियोंके समान परमानन्दमें मग्न हो गयी॥ ८॥
तं काचिन्नेत्ररन्ध्रेण हृदिकृत्य निमील्य च।
पुलकाङ्ग्युपगुह्यास्ते योगीवानन्दसम्प्लुता॥ ८
सातवीं गोपी नेत्रोंके मार्गसे भगवान्को अपने हृदयमें ले गयी और फिर उसने आँखें बंद कर लीं। अब मन-ही-मन भगवान्का आलिंगन करनेसे उसका शरीर पुलकित हो गया, रोम-रोम खिल उठा और वह सिद्ध योगियोंके समान परमानन्दमें मग्न हो गयी॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.32.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 328) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/32/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)