श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

तं काचिन्‍नेत्ररन्ध्रेण हृदिकृत्य निमील्य च।

पुलकाङ्ग्युपगुह्यास्ते योगीवानन्दसम्प्लुता॥ ८✎ 2088

taṃ kācinnetrarandhreṇa hṛdikṛtya nimīlya ca|

pulakāṅgyupaguhyāste yogīvānandasamplutā|| 8

अर्थ

सातवीं गोपी नेत्रोंके मार्गसे भगवान्‌को अपने हृदयमें ले गयी और फिर उसने आँखें बंद कर लीं। अब मन-ही-मन भगवान्‌का आलिंगन करनेसे उसका शरीर पुलकित हो गया, रोम-रोम खिल उठा और वह सिद्ध योगियोंके समान परमानन्दमें म‌ग्‍न हो गयी॥ ८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2088 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): लकाङ्गॺुपगु → लकाङ्ग्युपगु

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