॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.32.3
तं विलोक्यागतं प्रेष्ठं प्रीत्युत्फुल्लदृशोऽबलाः।
उत्तस्थुर्युगपत् सर्वास्तन्वः प्राणमिवागतम्॥ ३
taṃ vilokyāgataṃ preṣṭhaṃ prītyutphulladṛśo'balāḥ|
uttasthuryugapat sarvāstanvaḥ prāṇamivāgatam|| 3
अर्थ
कोटि-कोटि कामोंसे भी सुन्दर परम मनोहर प्राणवल्लभ श्यामसुन्दरको आया देख गोपियोंके नेत्र प्रेम और आनन्दसे खिल उठे। वे सब-की-सब एक ही साथ इस प्रकार उठ खड़ी हुईं, मानो प्राणहीन शरीरमें दिव्य प्राणोंका संचार हो गया हो, शरीरके एक-एक अंगमें नवीन चेतना—नूतन स्फूर्ति आ गयी हो॥ ३॥