श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां ✎ 1157

स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः।

या माभजन् दुर्जरगेहशृंखलाः

संवृश्‍च्य तद् वः प्रतियातु साधुना॥ २२

na pāraye'haṃ niravadyasaṃyujāṃ

svasādhukṛtyaṃ vibudhāyuṣāpi vaḥ|

yā mābhajan durjaragehaśṛṃkhalāḥ

saṃvṛścya tad vaḥ pratiyātu sādhunā|| 22

अर्थ

मेरी प्यारी गोपियो! तुमने मेरे लिये घर-गृहस्थीकी उन बेड़ियोंको तोड़ डाला है, जिन्हें बड़े-बड़े योगी-यति भी नहीं तोड़ पाते। मुझसे तुम्हारा यह मिलन, यह आत्मिक संयोग सर्वथा निर्मल और सर्वथा निर्दोष है। यदि मैं अमर शरीरसे—अमर जीवनसे अनन्त कालतक तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्यागका बदला चुकाना चाहूँ तो भी नहीं चुका सकता। मैं जन्म-जन्मके लिये तुम्हारा ऋणी हूँ। तुम अपने सौम्य स्वभावसे, प्रेमसे मुझे उऋण कर सकती हो। परन्तु मैं तो तुम्हारा ऋणी ही हूँ॥ २२॥✎ 1668 2089

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे
रासक्रीडायां गोपीसान्त्वनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः
॥ ३२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1157 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निरवद्यसंयुजा → निरवद्यसंयुजां
  • #1668 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वालोंसे → करनेवालोंसे
  • #2089 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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