श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

तत्रोपविष्टो भगवान् स ईश्‍वरो

योगेश्‍वरान्तर्हृदि कल्पितासनः।

चकास गोपीपरिषद्गतोऽर्चित-

स्त्रैलोक्यलक्ष्म्येकपदं वपुर्दधत्॥ १४

tatropaviṣṭo bhagavān sa īśvaro

yogeśvarāntarhṛdi kalpitāsanaḥ|

cakāsa gopīpariṣadgato'rcita-

strailokyalakṣmyekapadaṃ vapurdadhat|| 14

अर्थ

बड़े-बड़े योगेश्‍वर अपने योगसाधनसे पवित्र किये हुए हृदयमें जिनके लिये आसनकी कल्पना करते रहते हैं, किंतु फिर भी अपने हृदय-सिंहासनपर बिठा नहीं पाते, वही सर्वशक्तिमान् भगवान् यमुनाजीकी रेतीमें गोपियोंकी ओढ़नीपर बैठ गये। सहस्र-सहस्र गोपियोंके बीचमें उनसे पूजित होकर भगवान् बड़े ही शोभायमान हो रहे थे। परीक्षित्! तीनों लोकोंमें—तीनों कालोंमें जितना भी सौन्दर्य प्रकाशित होता है, वह सब तो भगवान्‌के बिन्दुमात्र सौन्दर्यका आभासभर है। वे उसके एकमात्र आश्रय हैं॥ १४॥✎ 1432

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1432 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महकसे → महँकसे

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